दरिंदें ( 3 )
दरिंदें ( 3 )
" किसका फोन था? " हर्ष ने भारी मन से पूछा।
" किसी रमन का। "
" अच्छा.....तुमने उठाया तो नहीं? "
" नहीं यार.... तूने मना किया था इसीलिए उठाया नहीं.... लेकिन तू एक बार बात कर लेता तो अच्छा रहता। "
" देख यार इंदर, फिलहाल इसका टाईम नहीं है हमारे पास ...... मुझे इस शहर की बहुत चिंता हो रही है.....अगर हमने जल्दी ही कोई कड़ा कदम नहीं उठाया तो इस पूरे शहर को जिंदा लाश बनते देर ना लगेगी। "
" लेकिन यार हम कर भी क्या सकते हैं? हमारे हाथ बंधे हुए हैं..... जो भी लोग जाॅम्बी बने हैं वे सारे के सारे या तो बड़े बड़े फिल्मी सितारे हैं या तो बहुत पैसे वाले परिवारों से हैं , उन्हें मारने पर हमें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है ।"
" और वो लोग जो आम लोगों को अपनी तरह जाॅम्बी बना रहे हैं उसका क्या?" ( मुट्ठी भींचते हुए ) " पहली बार इतना अफसोस हो रहा है , जिस किसी ने भी इन लोगों को जाॅम्बी बनाया है काफी सोच समझ कर ही बनाया है क्योंकि हमारी अंधी सरकार इतनी बड़ी बड़ी हस्तियों का मोह तब तक छोड़ने से रही जब तक की बात इन पर न आ जाये । "
" यार ( हर्ष के कंधे पर हाथ रखते हुए ) ज्यादा टेन्शन ना ले, चलकर खाना खाकर थोड़ा आराम कर ले , रात में दूसरी टुकड़ी गश्त लगाएगी ।" इंदर ने कहा।
उसके बाद हर्ष बिना कुछ कहे सामने दरवाजे की तरफ बढ़ गया।
सुबह का समय
वह एक छोटा सा कमरा था , जिसकी दीवारें और छत सफ़ेद रंग की थी, उस कमरे में सिर्फ एक जीरो वाल्ट का बल्ब लगा हुआ था जिस कारण वहां पर्याप्त रौशनी का अभाव था लेकिन चूंकि सुबह का समय था और उस कमरे में दाईं तरफ़ एक कांच की खिड़की भी मौजूद थी जिसमें से सूरज की काफी रौशनी अंदर आ रही थी, इसलिए उस छोटे से कमरे में उस समय काफी उजाला था।
कमरे की बाईं तरफ़ की दीवार पर लाईन से कुछ राईफलें टंगी हुई थी, उस कमरे में एक निश्चित दूरी से चार बंक बेड लगाए हुए थे, वह चारों ही बेड तीन तीन मंजिला थे, उन सभी पर ही सिपाही सो रहे थे, ऐसे ही एक बंक बेड पर सबसे नीचे वाले बेड पर हर्ष भी सो रहा था ।
उसने अपनी आर्मी की वर्दी की शर्ट उतारक अपने बेड के कोने में रखी हुई थी, और अभी उसने अपनी वर्दी का ट्राउज़र और काले रंग की आधी बाजू की टी शर्ट पहनी हुई थी , उस हाफ स्लीव टी शर्ट में उसकी कसरती बाजू साफ साफ दिख रही थी , वह टी शर्ट उसके बाजुओं पर थोड़ी सी कस भी रही थी लेकिन वह उसके ऊपर काफी फब रही थी ।
हर्ष का बेड खिड़की के एकदम पास था इसलिए उसके ऊपर सूरज की रौशनी पड़ रही थी , उस रौशनी को अपने आँखों पर पड़ने से रोकने के लिए उसने अपना एक हाथ अपनी आँखों पर रखा हुआ था ।
कुछ देर बाद उस कमरे में लगभग छह फीट का एक व्यक्ति प्रवेश करता है और कहता है " अरे सारे उठ जाओ.... अब तुम लोगों की बारी है गश्त लगाने की... "
उसकी आवाज़ सुनकर सारे सिपाही आँख मलते हुए उठ गए और अपनी अपनी राईफल उठाकर बाहर की ओर जाने लगे।
हर्ष ने भी फटाफट से मुस्कुराते हुए अपनी शर्ट पहनना शुरू किया , हर्ष को यूं मुस्कराता देखकर वह सिपाही हर्ष के पास आया और मुस्कुराते हुए बोला " क्या बात है बड़ा खुश नज़र आ रहे हो? "
" हाँ...... वो एक अच्छा सपना देख रहा था....बट आँख खुलते ही यह भयानक सच्चाई फिर सामने आ गई। " कहते हुए हर्ष की आवाज में गंभीरता आ गई।
" कोई नहीं यार.... एक बार यह सब ठीक हो जाए फिर हम सभी वापस अपनी नाॅर्मल लाइफ जी पाएंंगे। "
" मुझे नहीं लगता कि हम में से कोई भी इससे बच पाएगा... आज नहीं तो कल हम सभी इस वायरस की चपेट में आ जाएंगे.....पहले हम लोग... फिर धीरे धीरे करके इस शहर के सारे लोग और फिर इस देश के सारे लोग...... " हर्ष ने निराशा भरे स्वर में कहा।
" ऐसा कुछ नहीं होगा..... देर सवेर ही सही इस समस्या का हल जरूर निकलेगा..... तुम चलकर नाश्ता कर लो फिर तुम्हें गश्त लगाने भी जाना है। "
" हाँ " हर्ष ने कहा और उसके बाद वह भी अपनी राईफल उठाकर बाहर निकल गया।
हर्ष नाश्ता करने के लिए कमरे से बाहर निकलकर काॅरिडोर में आगे की तरफ बढ़ने लगा , हर्ष जिस कमरे में सो रहा था वह कमरा भले ही काफी छोटा था लेकिन कमरे के बाहर का काॅरिडोर बहुत ही लम्बा था , वह पूरा काॅरिडोर भी उस कमरे की ही तरह सफे़द रंग में रंगा हुआ था , उस लम्बे काॅरिडोर में पीछे की तरफ दो बड़ी बड़ी काँच की खिड़कियाँ थी जिसमें से सूरज की रौशनी अंदर आ रही थी, उस काॅरिडोर में ऊपर छत की ओर एक निश्चित दूरी से बड़ी बड़ी सफे़द ट्यूबलाईटें लगी हुई थी, उस काॅरिडोर के दोनों ओर ही एक निश्चित दूरी से बहुत से कमरे बने हुए थे , उन कमरों के दरवाजों से एक निश्चित दूरी पर कुछ इनडोर प्लांट भी लगाए हुए थे जो कि वहाँ की काफी शोभा बढ़ा रहे थे ।
हर्ष नाश्ता करने जा ही था कि उसे सामने से पीठ पर बैग टाँगे इंदर आता हुआ दिखाई दे रहा था , वह काफी परेशान लग रहा था इसीलिए हर्ष ने उसे रोका और पूछा " क्या बात है? इतने परेशान क्यों लग रहे हो? "
" क्या बताऊं यार..... ये मिनिस्टर देव राणा पूरा पागल हो गया है.... " इंदर ने गुस्से में कहा।
" क्यों यार ? ऐसा क्या हो गया? "
" अरे यार उसे पता है कि शहर में क्या हो रहा है ऐसे में उन्हें और उनके परिवार को घर पर छिपकर रहना चाहिए ना? लेकिन उनके बेटे को तो फार्महाउस में पार्टी करनी है ...." इंदर ने मुँह बनाते हुए कहा।
" क्या?!? उनका दिमाग तो ठिकाने पर है ना? अगर वहाँ उनके बेटे पर किसी ज़ोम्बी ने हमला कर दिया फिर? "
" इसीलिए तो यार उन्होंने 50 कमांडों को उनके बेटे के गार्ड के तौर पर उसके साथ जाने के लिए कहा। "
" क्या?!? लगता है कि इस आदमी का दिमाग पूरा खराब हो गया है.....अगर हम लोग उसके बेटे की रक्षा करेंगे तो शहर के लोगों की रक्षा कौन करेगा? और वैसे भी भला ऐसी सिचुऐशन में कौन सा पिता अपने इकलौते बेटे को बाहर पार्टी करने जाने के लिए कहता है ?"
" अरे यार उनका बेटा बहुत जिद्दी है , उसने जिद्द पकड़ ली कि उसने फार्म हाउस में दोस्तों के साथ पार्टी करनी है। "
" बट फिर भी यार, उन्हें अपने बेटे को समझाना चाहिए था, हर बार बच्चों की जिद्द के आगे झुकना ठीक नहीं है, अरे देखना भी तो चाहिए ना कि बच्चों की जिद्द जायज़ है या नहीं? "
" अब क्या करें यार..... ड्यूटी है करनी तो पड़ेगी ही..... मेरी ड्यूटी भी लगी है उनके बेटे के साथ, वहीं जा रहा हूँ , चलता हूं। " इंदर ने कहा।
" चल ठीक है, अपना ख्याल रखना। " हर्ष ने कहा और उसके बाद हर्ष उस लम्बे काॅरिडोर से होते हुए दाईं तरफ मौजूद सीढ़ियों से नीचे की ओर जाने लगा और इंदर ने आगे जाकर एक दरवाज़ा खोलकर कहा " पंकज जल्दी चलो आज हमारी ड्यूटी मिनिस्टर के बेटे के साथ लगी है ।"
क्रमश:....... रोमा..........